देश कोरोना से लड़ रहा है और गृह मंत्रालय राजनीतिक विरोधियों से










देश कोरोना से लड़ रहा है और गृह मंत्रालय राजनीतिक विरोधियों से

आइसा दिल्ली












बीते सोमवार दिल्ली पुलिस कंवलप्रीत कौर के दिल्ली स्थित घर पर गयी और दंगों की जांच के नाम उनका फोन ज़ब्त कर लिया। फोन ज़ब्त करने के लिए पुलिस ने जो ज्ञापन दिया, उसमें एक एफआईआर का भी हवाला दिया गया था, जिसमें यूएपीए जैसे चार्ज लगाने का ज़िक्र भी था। अब ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार की आलोचना करने वाले छात्रों और एक्टिविस्टों को बिना ट्रायल या जमानत के जेल के भीतर ठूंसने के लिए यूएपीए कानून को बहाना बना लिया गया है। 





फरवरी माह में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार बताकर, दिल्ली पुलिस का  पुलिस लगातार उन छात्र नेताओं को निशाना बना रही है, जो मोदी सरकार के आलोचक रहे हैं और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का विरोध कर रहे थे। हाल में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की छात्र नेता सफूरा ज़रगर, मीरान हैदर को दंगों की जांच के नाम पर हिरासत में ले लिया गया था और बाद में उन पर उमर खालिद के साथ आतंकवाद निरोधक कानून यूएपीए लगा दिया गया था। सफूरा ज़रगर को तो गर्भवती होने के बावजूद जेल भेज दिया गया है। इस कड़ी में अगला नाम छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) की दिल्ली यूनिट की अध्यक्ष कंवलप्रीत कौर का भी जुड़ गया है। 




बीते सोमवार दिल्ली पुलिस कंवलप्रीत कौर के दिल्ली स्थित घर पर गयी और दंगों की जांच के नाम उनका फोन ज़ब्त कर लिया। फोन ज़ब्त करने के लिए पुलिस ने जो ज्ञापन दिया, उसमें एक एफआईआर का भी हवाला दिया गया था, जिसमें यूएपीए जैसे चार्ज लगाने का ज़िक्र भी था। अब ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार की आलोचना करने वाले छात्रों और एक्टिविस्टों को बिना ट्रायल या जमानत के जेल के भीतर ठूंसने के लिए यूएपीए कानून को बहाना बना लिया गया है। 

छात्र संगठन आइसा ने इस पुलिसिया कार्रवाई का विरोध किया है। संगठन द्वारा जारी किये गये बयान में कहा है: “नागरिकता संशोधन कानून के विरोधी एक्टिविस्ट असम के अखिल गोगोई से लेकर जामिया छात्रों-एक्टिविस्टों तक को झूठे मामले बनाकर सख़्त व काले कानूनों के तहत फंसाया गया है। ठीक ऐसा ही उत्तर प्रदेश में भी हुआ था, जब नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शन स्थलों से छात्र-एक्टिविस्टों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। भीमा कोरेगांव मामले में अभी तक 11 बुद्धिजीवियों, प्रोफेसरों और एक्टिविस्टों को यूएपीए लगाकर जेल में डाला जा चुका है। हाल में, सीएए के विरोध प्रदर्शनों में अपनी आवाज़ शामिल करने वाले और कश्मीर में लॉकडाउन करके धारा 370 हटाने के विरोध में अपने आईएएस पद से इस्तीफ़ा दे देने वाले कन्नन गोपीनाथन पर भी दमन और दीव में मुकदमा दर्ज़ किया गया है, और आरोप लगा दिया गया कि वे नौकरी पर लौटने से मना कर रहे हैं।



यह स्पष्ट है कि बहाने चाहे जो भी दिये जा रहे हों, लेकिन योजना एक ही है- असहमति की आवाज़ों को निशाना बनाना व जेल में डालना, और भारतीय संविधान की हिफ़ाज़त में बोलने की हिम्मत करने के लिए दंड देना।” 


आइसा के अनुसार, “दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा कंवलप्रीत कौर को निशाने पर लेने की यह कार्रवाई 25 अप्रैल, 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी उस रिपोर्ट के बाद हुई है, जिसमें दिल्ली पुलिस ने दावा किया था कि 9 लोगों के व्हाट्सएप चैट पढ़ने के बाद उसे कुछ सबूत मिले थे, जिसके आधार पर उन्होंने कई छात्रों और एक्टिविस्टों के ख़िलाफ़ यूएपीए का इस्तेमाल किया है और वह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई), जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (जेसीसी), पिंजरा तोड़, आल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) के कई सदस्यों तथा दिल्ली यूनिवर्सिटी व जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के कुछ पूर्व और वर्तमान छात्रों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करने की दिशा में बढ़ रही है।”