युद्ध समाधान नहीं हो सकता, कभी भी नहीं!

(फोटो- आरा भोजपुर में शहीद चंदन यादव को श्रद्धांजलि देते भाकपा (माले) नेता राजू यादव)


 


युद्ध समाधान नही हो सकता, कभी भी नही!


शिवानी पांडे


मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर।


हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी।


और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी। हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।


अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई। जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने वो हँसती-खेलती लड़की घूमने लगी जो खुशमिजाज थी, जो जिंदादिल थी, जो जिंदगी से भरपूर थी। सबसे पहले ख्याल आया अभी तो वो 26-27 साल की है 3 साल का बच्चा है उसका अब आगे क्या करेगी? अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है उसके सामने।


मैं जानती हूँ वो खड़ी होगी और मजबूती के साथ खड़ी होगी। वो फिर से हँसेगी, मुस्कुराएगी, अपने बच्चे को अपने तरह एक शानदार जिंदादिल इंसान बनाएगी। लेकिन पति का वो खालीपन कब और कैसे भरेगा? हम में से कोई नही जानता।


20 दिन बाद शायद देश भूल जाएंगा कि उसके किसी जवान ने उनके लिए शहादत दी थी। पुलवामा, बालाकोट के शहीदों की केवल संख्या याद है हमें अब, शायद ढंग से वो भी नही। गलवान घाटी के शहीदों का कुछ दिन तक नाम याद रहेगा और फिर कुछ टाइम बाद केवल आँकड़े याद रहेगे। लेकिन उनके परिवारों के लिए वो आँकड़े नही है, उनकी जिंदगियां है वो, जो देश के लिए शहादत और अपने परिवारों के लिए एक खालीपन छोड़ गए है। जो कभी नही भरता।


2002 में कश्मीर में मेरे फूफा जी शहीद हुए थे, बुआ की उम्र तब 22 साल थी सिर्फ, उनकी शादी को तब 2 साल ही हुए थे और उनका बच्चा तब महज एक साल का। आज तक भी उनसे फूफा जी के बारे में बात करने की हिम्मत नही होती। मेरी माँ - पापा से भी ज्यादा बात बुआ से होती है लेकिन आज भी जब फूफा जी के शहादत की तारीख (7 अगस्त) आती है एकदम उसी दिन उनको फोन नही कर पाती पता नही क्यों? हम आज 18 सालों बाद भी वो खालीपन नही भर पाये।


जब भी सीमा पर हलचल होती है तो पूरा देश युद्ध करने के लिए तैयार बैठा रहता है। युद्ध को ही जवाब देना मान लिया जाता है। पता नही हम कब समझेंगे कि युद्ध कभी इनका हल नही हो सकता।


युद्ध केवल दो देशों के बीच नही लोगों के बीच होता है, उनके परिवार इसके परिणाम को सालों-साल झेलते है। युद्ध का वो एक पल उनकी जिंदगियों को बदल देता है।


हो सकता है आप संख्या बल के आधार पर जीत जाय पर उस जीत की कीमत दोनों देशों के कई अनाथ बच्चे, विधवा पत्नियाँ और बूढ़े बेसहारा माँ -बाप चुकाएंगे ताउम्र! युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!